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#व्यंग्य - अपनी जात का ​पुरोहित

डोम लोगों के हाथ का पानी पीना भी हिंदू धर्म में मान्य नहीं है। पंडित, ठाकुर और कायस्थ जाति और छुआछूत के नामपर उनसे इस तरह का व्यवहार करें तो एक बार यह समझा जा सकता है कि धर्म की कुरीतियों ने उनकी आँख पर पर्दा डाल रखा है, परंतु उनके अपनो द्वारा व्यवहार समझ नहीं आता।
समाज में अपनी जड़ जमाकर लोगों को आपस में विभाजित करनेवाली वर्ण व्यवस्था ने कानून द्वारा आरक्षण दिए जाने पर अपना घर किले से मजबूत कर लिया है, जिसे अब कोई कानून चाहकर भी नहीं तोड़ सकता है क्योंकि इसे तोड़ने के लिए कानून बनाने का साहस अब नेताओं में नहीं है।
डोम के विवाह में एक पुरोहित मंत्र पढ़ रहा था। मुझे गांववालों द्वारा साफ - साफ कह दिया गया था कि उस तरफ मेरा जाना वर्जित है, परंतु मैं अपने जीवन का पहला डोम विवाह देखना चाहता था।
पुरोहित जी को मंत्र पढ़ता देख मैं आश्चर्यचकित हो गया। जहाँ कोई पानी नहीं पीता वहाँ भले पुरोहित जी जी क्यों मंत्र पढ़ रहें हैं।
पुरोहित जी को मंत्र पढ़ता सुनकर कुछ अजीब लग रहा था। पुरोहित जी जी के मंत्र में दिनचर्या के शब्द थे जिसके साथ वो बस स्वाहा लगा रहें थे और हवन - कुंड में आहूति दे रहें थे। विवाह संपन्न होने के बाद पुरोहित जी एक तरफ बैठ गए। एक युवक ने जब पंडित जी के सामने पीने के लिए पानी का लोटा रखा तो एक बुजुर्ग आदमी ने लड़के का कान खींचते हुए लोटा वहाँ से लोटा हटा दिया।
पता करने पर मालूम हुआ की पुरोहित जी किसी जमाने में डोम थे। कुछ साल पहले वो बनारस के एक घाट पर रह गए और महीने भर बाद वहाँ से जनेव पहनकर पहुँचे। अब डोम समाज के पुरोहित थे और डोम लोगों के यहाँ खाना और पानी नहीं छूते थे। जब अपनी ही जाति का अपने बीच पला - बढ़ा मनुष्य इस तरह का व्यवहार करे तो दूसरे लोगों को किस बात का दोष देना।
डोम समाज जैसे पुरोहित हर समाज और जाति में हैं। जरुरी नहीं की उन्होंने पुरोहित वाला चोला धारण किया हो। वो बस जब अपने लोगों से आगे विकास कर जाते हैं तो उन्हें अपनो को पहचानने में बड़ी परेशानी होती है।

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