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#व्यंग्य - सोमवार की आत्मकथा

मैं सोमवार हूँ।

मैं सप्ताह का एक दिन हूँ। मैं रविवार के बाद और मंगलवार से पहले आता हूँ। मेरा नाम सोम भगवान शिव के नाम से पड़ा।

भारत तथा विश्व के कई देशों में मैं सामान्य कामकाज का प्रथम दिन होता हूँ इसलिए लोग मुझसे इर्ष्या करते हैं। सतयुग में मेरा यह हाल नहीं था क्योंकि उस समय लोग दान-धर्म पर विश्वास करते थे। सोमवार के दिन लोगों को बहुत मात्रा में दान मिलता था इसलिए लोग मेरी पूजा करते थे।

त्रेता युग में माता सीता ने मुझे एक नए शिखर पर पहुँचा दिया। उन्होंने उत्तम वर प्राप्ति के लिए सोमवार के दिन व्रत रखना आरंभ किया। उसके बाद स्त्रियों ने दिल खोलकर मुझे अपना प्यार दिया। स्त्रियों के इस प्यार को पाकर मैं बहुत प्रसन्न था।

द्वापर युग में महाभारत युद्ध के समय मेरा महत्तव बहुत बढ़ गया। श्री कृष्ण ने गीता में सोमवार को घरपर रहकर आराम करने के लिए कहा। महाभारत युद्ध के समय सोमवार को छुट्टी की घोषणा भी की गई। सभी सैनिक और योद्धा हर सप्ताह मेरे आने का इंताजर करते थे।

कलयुग में जब मुगलों ने भारत पर कब्ज़ा करना आरंभ किया तब तक मैं ख़ुशी का सूचक था। मुगलों के बादशाह अकबर ने उसके शासन काल के दौरान शनिवार और रविवार की छुट्टी का चलन आरंभ किया, जिसके कारण दो दिन की छुट्टी के बाद मैं सप्ताह के काम काज का पहला दिन बन गया।

अकबर की बर्बरता के कारण मेरे सम्मान का पतन आरंभ हुआ। सोशल मीडिया और डेटिंग वेबसाइट के आते - आते मेरा महत्तव लगभग समाप्त हो गया। वर प्राप्ति के लिए सोमवार के व्रत की जगह शादी की वेबसाइटों ने ले लिया। दो दिन की छुट्टी से लौटा व्यक्ति जब अपने अधूरे काम के लिए बॉस से गाली खाने लगा तो उसने अपना सारा दोष मुझपर लगा दिया।

मैं सोमवार स्वयं रविवार के दिन आना चाहता हूँ लेकिन आज के माहौल में लोगों के बर्ताव और राजनैतिक विचारधारा को देखते हुए, अब यह संभव नहीं है। मुझे तो डर है कि आज के नेता मुझे भगवान शिव के नाम के कारण ३० घंटे का ना कर दें।

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