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#व्यंग्य - देशभक्त कौन है?

सन १९४७ के बाद अब जाकर लोग देश भक्ति को लेकर फिर से सचेत हुए हैं। देशभक्ति को लेकर बढ़ते विवादों ने देशभक्त की परिभाषा को फिर से जागृत कर दिया है लेकिन इस परिभाषा की सबसे अच्छी बात यही है कि इसकी कोई परिभाषा नहीं है।
देशभक्त कौन है?
क्या आपका सब्जीवाला देशभक्त है जो हर महीने तीस हजार से अधिक की कमाई घर बिना किसी को बताए घर ले जाता है या फिर वो सोनार देशभक्त है जो १% वैट बचाने के लिए आपको बिल नहीं देता है और आप भी १% की चाह में बिल नहीं लेते हैं।
कौन देशभक्त है? कहीं आप अपनी बिल्डिंग में रहनेवाले इंजीनियर को देशभक्त नहीं समझते जो हर कॉन्ट्रैक्ट के पीछे ३% का कमीशन खाता है या फिर डॉक्टर साहब जो रोजाना ३००० हजार से ४००० कमा कर घर ले जातें हैं लेकिन इनकम टैक्स रिटर्न निल का फाइल करते हैं।
व्यापारी देशभक्त हो सकता है क्या? धार्मिक संस्थानों को चेक देकर कॅश लेना और कॅश लेकर चेक देने वाला व्यापारी कैसे देशभक्त हुआ। और उस चार्टर्ड अकाउंटेंट को कैसे देशभक्त माने जो अपनी धर्मपत्नी के खाने का बिल भी क्लाइंट से वसूल लेता है और लोगों को फर्जी बिल बनाकर टैक्स बचाने की सलाह देता है।
नेताओं को तो किसी भी तरह देशभक्त नहीं माना जा सकता है। करोड़ो रुपये खाकर भी जिस प्रजाति को कब्जियत की शिकायत ना हो उनमे तो देशभक्ति हो ही नहीं सकती है। कुछ नेता पैसा नहीं खाते हैं, वो तो बस अपने रिशेतदारों को सरकारी पद पर नौकरियाँ दिला देते हैं।
सरकारी दफ्तर में काम करनेवाला भी देशभक्त नहीं हो सकता क्योंकि उसका तो काम ही काम ना करना है और यदि काम कर दिया तो उसे सरकारी पगार के अलावा भी पैसे चाहिए। सबसे प्रमुख बात जो सरकारी बाबु स्वयं सरकारी तंत्र को दिमग की तरह चालता रहता है, उसे सरकारी तंत्र से हमेशा शिकायत रहती है।
सरकारी बाबू के देशभक्क्त होने का सवाल ही नहीं लेकिन सेना के कई लोग उनकी कैंटीन में मिलनेवाले बिना टैक्स के सामान को बाहर लाकर बेचते हैं तो क्या उन्हें देशभक्त कहा जा सकता है, क्या अतरिक्त आय कमाने के लिए उन्हें छूट मिल सकती हैं।
अपनी फिल्म की सफलता के लिए दूसरे कलाकार, निर्माता और निर्देशक की फिल्मों का सिनेमा में चपालता से ना लगनेदेने वाला फ़िल्मकार देशभक्त है क्या? जो समाज की बुराइयां सुनहरे पर्दे पर दिखाने के बाद गैर कानूनी गांजा पीकर लड़कियों और लड़कों का शोषण करता है।
पुलिस को तो देशभक्त समझना भी गलत होगा क्योंकि उनके काम को लगभग - लगभग सभी ने नजदीक से देखा है। क्या वो डाकिया देशभक्त हो सकता है जिसने दिवाली पर बक्षिस ना मिलने के कारण आपकी चिट्ठियों को समय पर पहुँचाना छोड़ दिया।
ना गांधी देशभक्त थे और ना मैं देशभक्त हूँ। बाजारवादी अर्थव्यवस्था में हर कोई मौका परस्त है। आप, मैं और गांव का वो किसान भी जिसे खेती होने के बाद भी ३₹ किलो में गेहूँ और चावल चाहिए और वो गांव प्रधान जो मरे हुए लोगों को भी सरकारी मदद पहुँचा देता है, वो तो देशभक्त हो ही नहीं सकता।
आज के इस युग में कोई देशभक्त नहीं है। देशभक्ति एक प्रोडक्ट है जिसे बेचा जा सकता है। जिससे लाभ कमाया जा सकता है और इसलिए हर कोई वही कर रहा है। अब कोई देशभक्त नहीं है सब ऑप्पोरचुनिस्ट हैं। सत्य यही है बाकी आप दिल को जो समझाना चाहें, समझा सकते हैं।

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