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#व्यंग्य - आजकल की युवतियों को विरह रोग क्यों नहीं होता?

पहले जमाने की फिल्मों और कहानियों में युवतियों को जो मर्ज सबसे अधिक होता था वो था विरह रोग। अपने प्रेमी से नाक तक पानी में डूब कर प्यार करनेवाली युवतियों को यह रोग उस समय होता था जब उनका प्रेमी नौकरी की तलाश में गांव से शहर और शहर से विदेश चला जाता था।
प्रेमी विदा लेते समय युवती को इस बात का वचन देता था कि वहाँ जाते ही जैसे ही ढंग की नौकरी मिलेगी वो गांव आकर अपनी प्रियंवदा को ले जाएगा परंतु किसी ना किसी परिस्थिति में उलझ जाने के कारण प्रेमी ऐसा नहीं कर पाता था और युवती अपने प्रेमी की विरह वेदना में घुटती रहती थी।
आजकल की युवतियों को विरह रोग क्यों नहीं होता?
पहले तार से संदेश पहुंचाने वाले समाज ने पेजर से होते हुए मोबाइल से संदेश पहुंचाना शुरू कर दिया। आजकल सब कुछ तेज होता है।
मेरे एक मित्र जो स्वयं बहुत पढ़े-लिखे थे, उन्हें एक बहुत पढ़ी-लिखी मोहतरमा से एक महीने में प्यार हो गया और छह महीने में में उनका विवाह हो गया। नौवें महीने जब मैंने उनसे खुशखबरी के बारे में पुछा तो उन्होंने अपने तलाक का किस्सा सुना दिया।
अब युवतियों को विरह की आग में नहीं जलना होता क्योंकि विरह नाम की कोई बीमारी ही नहीं बची है। प्रेमी के गांव से शहर या शहर से विदेश जाने के बाद युवतियाँ झठ से दूसरा प्रेमी ले आती है और उनकी प्रेम कहानी निरंतर चलती रहती है।
UNESCO ने अपने एक रिपोर्ट में जिक्र करते हुए बताया है कि सन दो हजार बीस तक भारत की सभी युवतियाँ विरह रोग से मुक्त हो जाएंगी।

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