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#व्यंग्य - गांधीवादी गदहा

मेरे धोबी के पास एक गदहा था। बेचारा इतना सज्जन गदहा था कि उससे मिलने के बाद मैंने लोगों को गदहा बोलना छोड़ दिया क्योंकि लोगों की गलती पर गदहे का अपमान करना सही नहीं था। वो भी तब जब मैं इस तेजस्वी गदहे से मिल चुका था।
यदि इस गांधीवादी गदहे की पुरानी पीढ़ीयों पर नजर डालें तो उसके दादा जी जिस धोबी के यहाँ काम करते थे उसके यहाँ गांधी जी की धोती धुलाई के लिए आती थी, वैसे गांधी जी स्वयं काम करने पर विश्वास रखते थे इसलिए गदहे के दादा की कथा गलत साबित हो सकती है।
कांग्रेस पार्टी हमेशा कहती है कि भारत की आजादी में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है परंतु १९४७ की कांग्रेस पार्टी के नेता और आज के कांग्रेस पार्टी के नेता के सिद्धांतों में बहुत गिरावट आई है। लेकिन इस गदहे को देखकर लगता है कि इसका सिद्धांत इसके दादा जी से भी ऊपर गया है।
दो-तीन महीने पहले एक दिन कार्यालय नहीं गया तो गदहे से मिलना हुआ। देखने में बहुत कमजोर और बीमार लग रहा था। मैंने पूछा, "क्या भाई मालिक खुराक नहीं दे रहा है क्या?"
गदहे ने जवाब दिया,"मालिक तो खुराक दे रहा है परंतु मैंने ईमानदारी से जीवनयापन का प्रण लिया है और मालिक पैसे कमाने के लिए बहुत हेरा-फेरी करता है इसलिए उसका दिया खाना बंद कर दिया है।"
आज शाम जब दरवाजे पर बेल बजी तो मुझे ही उठकर दरवाजा खोलना पड़ा। दरवाजे पर धोबी खड़ा था और गदहे की जगह साइकिल पर कपड़ा रखा था। मैं पूछता उससे पहले ही धोबी ने कहा, "सर, गांधीवादी गदहा था इसलिए ईमानदारी से रहना चाहता था, भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहा था और एक दिन स्वर्ग सिधार गया।"
धोबी ने कहा नहीं परंतु उसकी आँखों से लगा ," सर स्वर्ग की राह स्वयं नहीं जाता तो मैं उसे स्वर्ग छोड़कर आता क्योंकि ऐसे ईमानदार सिद्धांतवादी और गांधीवादी गदहे की आज किसी को भी जरूरत नहीं है।"

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