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#कविता - मरने पर मिलेंगे

आज उस पेड़ को कटते देखा,
कुछ महीनों से सुखकर बस खड़ा था,
उसके चारों तरफ जो दीवारें थी वो भी गिर गई थी,
अब उसे काटकर एक दरवाजा बनाने वालें हैं।

जब मैं छोटा था तब वो भी मेरे उम्र का था,
उसकी बड़े जतन से पहरेदार रखवाली करता,
ना आने देते उसकी तरफ लोगों को,
खरोंच का डर था और उसके बहेक जाने का।

धीरे धीरे जब बड़ा हुआ
और कुछ फल लग गए उसपर
तो उसका रूप ऐसा
जैसे हो कोई अप्सरा इंद्र के आंगन की।

मैं हमेशा उससे मिलना चाहता था,
लेकिन कभी मिल न सका,
धर्म एक सा ना था हमारा,
और जड़े मेरी, मुझे दबाकर रखती।

मैं तो तैयार रहेता आँधियों के लिए,
फेंक देता अपनी कुछ टहनियाँ और पत्ते उसकी तरफ,
उसे हमेशा डर रहता,
कही देख न ले चौकीदार मेरी हरकतों को,
और बना दे और भी ऊंची दीवार जहाँ से हम ना दिखें।

पता नही मुझे,
कुछ पंक्षी डालपर बैठकर आपस में बातें कर रहें थे।
एक बार उसने भी मुझसे मिलने की कोशिश की थी,
मिलने की कोशिश पर पहरेदार ने काट दी डालें उसकी,
और पत्तों की हरियाली को झाड़ दिया।

कुछ दिनों बाद मैं भी कट जाऊँगा,
और उस दरवाजे का मोहारा बनूंगा,
जहाँ उसे लगाने वालें हैं,
जीते जी तो ना सही मरने पर हम साथ आने वाले हैं



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