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#कविता - मेरा स्टडि लैंप कल लड़ रहा था मुझसे

मेरा स्टडि लैंप कल लड़ रहा था मुझसे,
शिकायत है कि मैं रोज मिलता नही उससे,
पहले तो  देर रात तक जागकर बातें करता था,
याद है कई बार घर वाले चिल्लाते थे,
लेकिन तुम नही मानते थे बात उनकी लेखक,
जलाकर मुझको उन किताबों के पन्ने पलटते थे,
अब नही रहा वो रिश्ता मोबाइल के आने पर,
मुझसे तो अब व्यवहार होता है ऐसा
कि मैं जौनपुर का पुराना पुल हूँ,
किताबों पर छनककर जब मैं उजियारा फैलाता था,
तुम्हारे मोबाइल कि किताबों में वो बात कहा,
उसकी रोशन तो आँखों में चुभती है और
मैंने तो कई मंजिले पार कराई हैं तुम्हें,
कभी समय मिले तो आना मेरी तरफ,
वो होल्डर मेरा अब कुछ ठीक नही रहता,
गल गए हैं तार मेरे और 
थोड़े तुम्हारे शरारती चूहे ने कुतर दिए हैं,
गिन रहा हूँ अंतिम सांसें मैं,
किसी दिन घरवाले भंगार में बेच देंगे,
कभी समय मिले तो आना मेरी तरफ


2 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा स्टडि लैंप कल लड़ रहा था मुझसे,
    शिकायत है कि मैं रोज मिलता नही उससे,

    सुन्दर प्रस्तुति से मन मग्न हो रहा है.
    हार्दिक आभार जी.

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