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#कविता - बहता हुआ झरना

वो झरने 
जो पहड़ो से गिरते रहते हैं,
उन्हें देखा नही 
कभी आराम करते,
थकते तो वो होंगे 
तब पर भी मेहनत करते रहते हैं।

सतत जल का प्रवाह 
दरकार करता आगे बढ़ने की,
उसके हवा में फूटते फव्वारे 
गिरने पर चोट करते हैं,
कितना उजला है 
कितना उजला है 
वो काला पत्थर
जो झरने की चोट सहता है,
बह जाती मिट्टी सारी,
बन जाते जाते
बड़े बड़े खढ्ढे,
वो उजला पत्थर जो वहाँ नही होता।

वही झरने के बगल में,
कुछ लताएँ हैं
उन्होंने घेर रखा है झरने को,
कई बार बांधकर
उसे रोकने की कोशिश की है,
लेकिन वो झरना भी
दुबकर निकल जाता है तेजी से।

कुछ राहगीर उस तरफ आयें तो,
उन्हें नहलाता ठंडे पानी से,
पिलाता मीठा जल अपना
लोगों को तरोताजा कर देता है।

वो झरने 
जो पहड़ो से गिरते रहते हैं,
उन्हें देखा नही 
कभी आराम करते,
थकते तो वो होंगे 
तब पर भी मेहनत करते रहते हैं,

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