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#कविता - ख्वाब बूझे नही हैं पूरी तरह से

ख्वाब बूझे नही हैं पूरी तरह से,
लेकिन फिर भी उनको दफना दिया,
उनकी सिहरन से तड़पता था मन,
वो रोज उठने की कोशिश में,
घाव को नासूर कर लेते थे।

ख्वाबों को जीने में कई दुसवारियाँ थी,
उन्हें साबित करने के लिए,
मुझे तोड़ने पड़ते कुछ रिश्ते,
जिन्हें मैंने बड़ी मुश्किल से संजोया था।

ख्वाबों का मुझपर कर्ज़ था,
इसलिए दफनाने से पहले,
उन्हें चूमा कलम से मैंने,
ख्वाब बूझे नही हैं पूरी तरह से,
लेकिन फिर भी उनको दफना दिया,

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