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#कविता - आज अलमारी साफ करते समय

आज अलमारी साफ करते समय,
कुछ पुराने चिथड़े निकल आए, 
कभी ये भी ख्वाब हुआ करते थे।

पुलिस वाला वो लिबास,
जिसे मैं पहनकर घूमता था,
सारे मोहल्ले में दरोगा बनकर,
और
कंधे पर लटकती सीटी,
जिसे बजा बजाकर,
मोहल्ला सिर पे उठा लेता था,
अब वो लिबास फट गया कई जगहों से।

एक स्वेटर मिला,
जिसे नानी ने बुनकर भेजा था,
किसी ने उसे उधेड़ने की कोशिश की है,
लेकिन नानी के प्यार की गिरहें उधेड़ नही पाये।

एक टूटा हुआ खिलौना मिला,
वो सैनिक जो बंदूक तानकर चलता था,
सिर अलग हो गया था सैनिक का,
लगता है बंद अलमारी में पहरेदारी करता था।
लगता है बंद अलमारी में पहरेदारी करता था।
किसी दुश्मन से मुठभेड़ में शहीद हो गया।

कुछ कागज के पुर्जे हैं,
खत लगते हैं, माँ ने जो लिखे थे,
एक तार भी है 
जिसने रुला दिया था मुझको।

आज अलमारी साफ करते समय,
कुछ पुराने चिथड़े निकल आए, 
कभी ये भी ख्वाब हुआ करते थे।

4 टिप्‍पणियां:

  1. भाई बहुत ही लाजवाब, दिल को छू लिया। आपके शब्दों के चयन की कला का कोई तोड़ नही। हर एक शब्द मे इतना दर्द भरा है कि अकस्मात ही मेरे नैनों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी और उसी धारा के साथ मेरी आँखों का कचरा भी बाहर निकल आया। अब जब भी मुझे अपनी आँखें साफ करनी होंगी, आपकी ये दर्द करूणा से भरी कविता पढ़ लिया करूँगा। आपको और आपकी इस रचना को मेरा शत शत नमन बन्धु।।

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    1. धन्यवाद शुभांश, मोदी जी से बोलकर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलवादो :)

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