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#व्यंग्य - अपने धंधे में एक जाएगा तो सब जाएंगे (क्रिकेट)

"अपने धंधे में एक जाएगा तो सब जाएंगे" ​सत्या फिल्म का डायलॅाग लिखा गया तो मुंबई अंडरवर्ल्ड के लिए गया था परंतु पिछले कुछ सालों में भारतीय क्रिकेट ने इसे आत्मसात कर लिया। जहाँ पैसा वहाँ अंडरवर्ल्ड और क्रिकेट में तो पैसा इतना है कि कई देशों की सालना आय उतनी नही होगी।

अंडरवर्ल्ड और क्रिकेट में अंतर है। एक जगह ईमान से देश बेचते हैं और दूसरी जगह देश के नाम पर ईमान बेच देते हैं। क्रिकेट एक मात्र ऐसा कानून है जिसे तोड़ने की सजा कभी किसी को नही मिली क्योंकि अपने धंधे में एक जाएगा तो सब जाएंगे।

सभी राजनैतिक दलों के लोग क्रिकेट के खेल में शामिल हैं। जिन्होंने कभी अपने जीवन में गिल्ली डंडा नही खेला वो क्रिकेट को सुचारु रुप से चलाने के लिए अपना कंधा दिये बैठें हैं। देशप्रेम के नाम पर नेताओं ने देश को गर्त में ढकेल दिया और धीरे धीरे खेलप्रेम के नाम पर क्रिकेट को भी गर्त में ढकेल रहे हैं।

बारहमासी आम के बारे में आपने सुना होगा। विज्ञान के विकास और आयात-निर्यात के चलते अब खाने-पीने की कई प्रजातियां बारहमास मिलती हैं। दूसरी तरफ क्रिकेट को भी धीरे-धीरे बारहमासी बना दिया गया है। खेल को अब मनोरंजन बनाकर पैसा कमाया जा रहा है।

पैसा बनाने के लिए सट्टेबाजी शुरू हो गई लेकिन आज तक कभी भी किसी क्रिकेटर को या उसके प्रशासनिक अधिकारी को इस काम में दोषी मानकर सजा नही मिली क्योंकि अपने धंधे में एक जाएगा तो सब जाएंगे। दूसरी तरफ क्रिकेट प्रेमी भी इस खेल को टीवी पर कोई और पर्याय ना होने के कारण देखते हैं।

क्रिकेट अब खेल नही एक व्यापार है जिसमें अंडरवर्ल्ड की तरह पैसे कमाने के लिए हर कोशिश को अंजाम दिया जाता है और सभी राजनैतिक दल इसमें लाभ बनाने में लगे हैं और कभी किसी गुनेहगार को सजा नही मिलने वाली क्योंकि अपने धंधे में एक जाएगा तो सब जाएंगे।


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