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#कविता - तेरे बिन गुलजार

यदि जो ना गुथते 
शब्दों को 
उनकी आत्मा से 
सोचो क्या होती 
उनकी हालत 
तेरे बिन गुलजार,

वो नज्मे 
जो तैरती है सतह पर 
कभी थककर 
किनारे बैठ जाती है 
वो डूबकर 
कैसे उभरती 
तेरे बिन गुलजार,

वो मिशरे 
जो तुमने गिरह से खोली थी
पीसकर जिस रेख्ते को 
तुमने गजल बनाई थी
वो लबो पर कैसे आती
तेरे बिन गुलजार,

पोटली वाले 
बाबा की मासूमियत 
बोस्की के पंचतंत्र में 
बचपन को 
फिर से जगाना
वो चूहिया 
कैसे बचती चील के चंगुल से 
तेरे बिन गुलजार,

वो सितारों से 
हमारी मुलाकाते
और
हमने तो अँधेरे को 
अँधेरा ही समझा था 
उसमे 
सुर्ख रोशनी का एहसास 
कौन कराता 
तेरे बिन गुलजार,

वो नग्मे तुम्हारे 
जो सुनाकर 
उनके बोसे लेता था
कैसा करता 
इजहारे मोहब्बत 
तेरे बिन गुलजार,

देखा है पानी 
हम सब ने 
समझते थे 
उसमे रंग नहीं होता
कौन बनता 
पानी को सतरंगी 
तेरे बिन गुलजार,

वो दर्द 
जो चुभते थे 
तनहा रातों में,
उन्हें शहद सा मीठा 
कौन करता 
तेरे बिन गुलजार,

दुआ है मेरी 
तू जिए हजारों साल
होंगी नीरस  
वो गजल की गालियाँ
वो नज्मों का लिहाफ 
तेरे बिन गुलजार, 

टिप्पणियाँ

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद - अभी बहुत दूर तक जाना हैं

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संत वाणी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत बढ़िया वाकई गुलज़ार साहब कमाल हैं और उन पर लिखी आपकी ये कृति भी कमाल

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  4. well written. feels like home...
    Gulzar is the Inspiration behind most of my own scribble.

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    उत्तर
    1. जी धन्यवाद, बस अब गुलज़ार को सुनाना है

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