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#कविता - किसान

एक बीज बंजर में पनपता है,
जमीन को हरा-भरा कर देता है,
हवा को साफ करता है,
मेघ खींचकर धरा को देता है,
जमीन की मिट्टी बाँध कर रखता है,
फल खिलाता, लकड़ी देता,
एक दिन काट दिया जाता है,
किसान देश का बीज है वो
जिसके कटने पर दु:ख होता
लेकिन पड़ता नही फरक किसी को,

सोचो बंजरभूमि को 
हरा ना किया होता उसने,
कहाँ जाते हम पिकनिक पर,
मिट्टी धीरे धीरे बह जाती
और ताल तल्लैया पट जाते,
फलो की मिठास कहाँ मिलती,
घर बनाते किस लकड़ी के,
किसान देश का बीज है वो
जिसके कटने पर दु:ख होता
लेकिन पड़ता नही फरक किसी को,

किसान देश का पेड़ है वो,
जो जल्दी जल्दी बढ़ता है,
जलता दोपहरी मे पेट भरता लोगो का,
बस बढ़ता है और मिटता है 
किसान देश का बीज है वो
जिसके कटने पर दु:ख होता
लेकिन पड़ता नही फरक किसी को,

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