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#कविता - क्या पाया तुमने


क्या ​अब
भी सोचते हो,
जन्नत पाओगे मरने के बाद,
​गलत सोचते हो तुम,
अब जहन्नुम मे
ढकेल दिए जाओगे,
क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?


वो कपड़े के बने नन्हे जूते
बच्चों के लहू से लथपथ,
मरने के बाद तुम
उन कपड़ों जितना
कफन नही पाओगे,
​​क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?


वो मां की गोद अब सूनी है,
उसके आंगन का माताम
रोज तुम्हें तड़पाएगा।
​रात को जब सोना चाहोगे,
बिलखती आवाजो से
डर जाओगे,​
​​क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?


तुतलाती जबान बोलता था वो
उसे तो अभी मजहब क्या है
पता भी नहीं था
उसके कत्ल से कौन सा
जिहाद जीत जाओगे।
​​क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?


​जिस खुदा के नाम पर,
ये कत्ले आम कर रहे हो,
वो खुद शर्मशार,
ये मंजर देखकर।,
क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?

क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?

टिप्पणियाँ

  1. ये दहशत गर्द जहन्नुम में भी जगह नहीं पाएंगे

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  2. ये सन्देश मोहम्मद का नहीं.. ये सन्देश अल-ज़वाहिरी और अबु-बक अल-बग़दादी जैसे लोगों का है. जो इस्लाम के रक्षक नहीं, इंसान के भक्षक हैं

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  3. बहुत ही करुनामय चित्रण

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  4. जो हुआ वो मानवता के इतिहास में बहुत ही शर्मनाक व दुर्भाग्यपूर्ण कहा जायेगा। मानव ने दानवपूर्ण कार्य किया है। मार्मिक घटना जो कभी न भूली जायेगी। शब्दों से यथार्थ का चित्रण किया है आपने।
    -ज्योत्सना खत्री

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  5. रोती माँओं का करुण क्रदन
    चुपचाप सुन रहा ये कायर उनका वतन
    उठो पोंछ दो आंसूं इनके
    अगर जिन्दा है तुम में वतन

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  6. क्या पाया तुमने अपने हाथों मानवता शर्मसार करवा कर

    वो भी तो किसी के बच्चे थे क्या पाया तुमने उनके गले में मौत का हार पहनाकर ।
    उनका भी तो हक था बच्चपन पर किताबों पर क्या पाया तुमने उनका बच्चपन नीलाम करा कर।
    वो तो कच्ची मिट्टी की मासुम मुरत थे क्या पाया तुमने मासूमियत का कत्ल करवाकर । और भी तो मजहब हैं रहते शांति से क्या पाया हे मुस्लिम तुमने अलकायदा और तालिबान बना कर ।
    अच्छे से तो चल रही थी मानवता , हे! इंसान क्या पाया तुमने फिर इस्लाम बना कर।

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  7. क्या पाया तुमने,
    ए कत्ले आम करके,
    वो मां की गोद अब सूनी है,
    उसके आंगन का माताम
    रोज तुम्हें तड़पाएगा।
    ​रात को जब सोना चाहोगे,
    बिलखती आवाजो से
    डर जाओगे,​
    बहुत ही मार्मिक.मासूमों का कत्लेआम शर्मनाक.
    नई पोस्ट : कौन सी दस्तक

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  8. रोज तुम्हें तड़पाएगा।
    ​रात को जब सोना चाहोगे,
    बिलखती आवाजो से
    डर जाओगे,​
    .........मासूमों का कत्लेआम शर्मनाक.
    अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    संजय भास्‍कर
    शब्दों की मुस्कुराहट
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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  9. पाकिस्तान वो देश है जहाँ "आतंकवादी" होना "स्वरोजगार" की श्रेणी में आता है,
    और "जेहादी" होना "परोपकार" की कैटेगरी में..."

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  10. आखें सूखी हैं, दिल बंजर है
    फैला जबसे हैवनी मंज़र है

    दर्द भरे शब्द पिरोये हैं आपने। :-(

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