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#कविता - हरा रंग

खुशहाली का जो प्रतिक था,
आज वो कहर बरपा रहा है,
मजहब के नामपर हरा रंग,
दुनिया पर कहर ढा रहा है

देखो चारो तरफ हमारे,
देखो चारो तरफ हमारे,
हरा रंग लोगो को
लाल चादर पहना रहा है

खुशहाली का जो प्रतिक था,
आज वो कहर बरपा रहा है,
मजहब के नामपर हरा रंग,
दुनिया पर कहर ढा रहा है

चलो मान जाऊं यदि मैं,
आतंक का धर्म नहीं होता,

फिर हर हिंसा के पीछे,
हरा रंग क्यों है होता,

कह सकते हो तुम,
मजहबी आँखों से,
कत्ले आम देखता हूं मैं ,
लेकिन मजहब की
चादर तुम भी जरा
एक बार आँखों से हटाओ,

खुशहाली का जो प्रतिक था,
आज वो कहर बरपा रहा है,
मजहब के नामपर हरा रंग,
दुनिया पर कहर ढा रहा है 


तुम्हारे बम कहा मजहब देखते है,
हिन्दू-मुस्लिम सबको फ़ना करते है
कुछ तो सीख लो अपने अशलहो से,
इंसान को न बांटो मजहबी रंगो से,

खुशहाली का जो प्रतिक था,
आज वो कहर बरपा रहा है,
मजहब के नामपर हरा रंग,
दुनिया पर कहर ढा रहा है


अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में लिखना न भूले और अगले सोमवार फिर मिलेंगे एक नई रचना के साथ।

36 टिप्‍पणियां:

  1. थोड़ा one sided हो गया लेकिन एक साइड की भी अच्छी है.. हिन्दुओं ने भी आतंकवाद का जवाब देने में काफी हिंसा की है. लेकिन वो शायद जरुरी भी था नहीं तो जैसे आज आतंकवाद जैसी टुच्ची चीज का डर है वैसे ही कल इंसानियत रह जाती

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  2. हरे पर अब भगवा छाने लग है।।।।

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    1. सही बात है लेकिन अभी हरा रंग भारी है।

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  3. जी कविता अच्छी है लेकिन "हरा रंग" शीर्षक एकतरफा लगता है !!

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  4. अच्छी रचना है।सभी धर्मो की कट्टरपंथी सोच शायद आतंक की वजह है वरना सभी धर्मो में अच्छे लोग भी हैं।ये मेरी सोच है।vijaya

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  5. सर्वप्रथम इस बेहतरीन लेख के लिए आप बधाई के पात्र हैं सो स्वीकारिए। आपने वास्तव में एक गंभीर मुद्दे पर एक बेहतर कोशिश की है और ये कविता भी अच्छी बन पड़ी है। परंतु किसी रंग-विशेष को किसी हिंसा-विशेष के लिए दोष देना या उसका प्रतीक मान लेना कहाँ तक उचित है (ये मेरे विचार हैं) ? हाँ, कुछ हिंसात्मक लोगों ने अवश्य इसका दुरुपयोग किया है परंतु आप ये क्यों भूल रहे हैं कि हमारे तिरंगे में हरा रंग समृद्धि और हरियाली का प्रतीक है। मैं मानती हूँ कि उन्हीं हिंसात्मक लोगों द्वारा केसरिया/भगवा रंग को सांप्रदायिकता की संज्ञा दे दी गयी है किन्तु यदि हम भी किसी रंग-विशेष को किसी हिंसा-विशेष का प्रतीक मानने लग जाएँ तो फिर उन हिंसात्मक और हम शान्तिप्रिय लोगों में फ़र्क क्या रह जाएगा ?
    हालांकि ये मेरे विचार हैं और मेरी समझ मुझसे हमेशा यही कहती है कि रंग जोड़ते हैं तोड़ते कत्तई भी नहीं। बाकी आपके विचारों का सम्मान करते हुये अपनी बता को यहीं समाप्त करूंगी और एक बार फिर इस रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिये और साथ ही शुक्रिया भी जो आप हमें हर हफ्ते एक नयी रचना के साथ ही एक नए मुद्दे से भी रूबरू कराते हैं। नमस्कार।

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    1. धन्यवाद, हम भी आपके विचारो का सम्मान करते है।

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  6. बेहतरीन, हकीकत से रूबरू कराती रचना है, मगर हो सकता है कुछ लोग इत्तेफाक न रखे !! उनसे सिर्फ ये पूछूंगा कि क्या कभी दूसरे के दर्द को महसूस किया है ?

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    1. हर धर्म में कुछ दर्द वाले मिल जायेंगे

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  7. इन पंक्तियों का कोई अंत नही !! बहुत खूब

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  8. really showing true colour in world...log mane ya na green colour first start converting everything in RED...thn safrron shows their colour to thm.... i dont think there is anything wrong in poem.... nice lines..कह सकते हो तुम,
    मजहबी आँखों से,
    कत्ले आम देखता हूं मैं ,
    लेकिन मजहब की
    चादर तुम भी जरा
    एक बार आँखों से हटाओ,

    उत्तर देंहटाएं
  9. सराहनीय प्रयास किया है। आतंकवाद से आज पूरा विश्व पीड़ित है और हरे रंग का किसी एक मजहब से संबध होने से आपने अपनी अभिव्यक्ति प्रकट की है लेकिन हरा रंग तो पूरी प्रकृति में व्याप्त है और प्रकृति मेँ हरा रंग हरियाली व खुशहाली का प्रतीक है। हाँ ये भी है कि आज कुछ इंसानियत के दुश्मनों द्वारा हरे रंग को आतंक का पर्याय बना दिया गया है। शुभकामनायेँ आपकी रचना के लिये।

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    1. धन्यवाद, जी मै भी यही कहना चाहता हूं की जो हरा रंगा खुशहाली का प्रतिक था आज उसके नाम पर कत्ले आम हो रहा है

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  10. विडम्बना है कि एक रंग विशेष भय का पर्याय बनता जा रहा है। आइना दिखाती रचना ।

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  11. जब प्रश्न करेगा एक किशोर क्यों सच तुमने न बतलाया,क्यों इतिहासों की स्याही में वीरों का रक्तिम वर्ण नहीं आया,तब प्रश्नों के बाण चलेंगे क्यों जलियावाला में निर्दोष मरे?कुछ बुरे भले कुछ सही गलत और कुछ तीखे व्यंग्य भरे,जब भारत की कड़वी सच्चाई अपने बचपन की आँखें खोलेगी,प्रश्न चिन्ह लिए बचपन के माथे की भृकुटी जरा तनी होगी,अपने रक्त के सम्मुख ही तब तुम किस मुँह से आओगे,तब मुख से शब्द नहीं फूटेंगे फिर हर पल मरते जाओगे।

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  12. बहुत खूब | आज के समय से बिलकुल संगत लिखा है | मैंने सभी कमेन्ट भी पढ़ी | पढ़ने के बाद लगा के इतना कुत्छ विश्व मै होने के बावजूद भी लोगो को सिकुलर की टोपी ही क्यु पसंद है | पता नहीं कब तक हम ऐसे ही सेकुलर बने रहेंगे | हमारी जो मानसिकता है की जब तक खुद पर कुत्छ न गुजरे तब तक तब कुत्छ नहीं बोलना , ठीक है मत बोलो पर जो बोल रहा है उसे तो कमसे कम बोलने दो | दुनिया मै इतना कुत्छ हो रहा है, आपने देखा किसी मुसलमान को खुल्ले आम टिपण्णी करते हुवे ?? नहीं | वो कभी नहीं करेगा ! कोय भी मुस्लमान भूले बगेर जुम्मा से जुम्मा नमाज मै इकठा होंगे पर इतने बड़े हादसे के बाद भी वो कभी इसका विरोध नहीं करेंगे ! वो कभी मोमबती नहीं जलाएंगे ! तो फिर कहेका सेक्युलर ? हर मुस्लमान के अन्दर एक मुजाहिदीन छुपा रहता है बस मोका मिलाना चाहए ! आंतंकवाद तब तक ख़तम नहीं जब तक ये COMMON और MODERATE मुस्लिम उनकी जिहाद के सामने इकठा होक सामने नहीं आयेंगे |

    (मैंने जोए मुसलमानों के खिलाफ बोला है वो सब मुसलमानों के लिए नहीं है पर ये बात भी सच है की मेरी ये कमेन्ट ज्यादातर मुसलमानों के लिए है | )

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    1. सही है और हर इंसान में एक राक्षस होता है, हमपर निर्भर है हम उससे कैसे लड़ते है

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  13. आतंकवाद और आतंकवादी पर सही कटाक्ष है।
    पर अशलहो मतलब?

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  14. आतंकवाद और आतंकवादी पर सही कटाक्ष है।
    पर अशलहो मतलब?

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