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#कविता - बाज़ार चहकता था हर शाम




जो बाज़ार चहकता था हर शाम,
आज कुछ सुनसान सा लग रहा है।

गोलगप्पे की दुकान का ठेला,
जलेबी वाले के चुल्हे पर से बर्तन,
चाय पे चुस्कियाँ लेते लोग,
कोई भी आज नजर नहीं आ रहा ।

नालीयो मे लाल रंग बह रहा है
पता चला रंग नहीं
पता चला रंग नहीं
ए हिन्दू - मुसलमान का खून है।

कल धर्म के नाम पर फसाद हुआ
सुनता हू
वो जलेबी वाला मीयां था
गोलगप्पे वाला हिन्दू था
मुझे कैसे पता चलता
जलेबियो ने कभी अजान नही पढ़ी
गोलगप्पो ने कभी गीता नही सुनाई

​इस फसाद में मरे लोग कम
लेकिन बाजार उजड़ गया
कई ठेलेवालो का
आशियान ढह गया।
आंसुओ का समंदर
सैलाब बन बह गया ।

जो बाज़ार चहकता था हर शाम,
आज कुछ सुनसान सा लग रहा है


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21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब लिखा, साधुवाद..!! लेकिन मित्र ये नेतागण कब समझेंगे इन भावनाओ को? ये लोग तो दूसरों के कपडे से लेकर.. उनकी थाली में खाने तक पर फतवा देने पर उतारू हैं.. नेतागिरी जो चमकानी है.. बाज़ार जले, गरीब मरे इस से क्या?

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    1. नेतागण कभी नहीं समझने वाले धर्म और मजहब को क्योंकि पहले हमें समझना होगा

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  2. सत्य के करीब रचना ....बधाई

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  3. बहुत अच्छा लिखा आपने. लिखते रहिए.

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  4. धर्म के ठेकेदार इंसानियत को नहीं समझते। बहुत अच्छा लिखा है।
    मेरी सोच मेरी मंजिल

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    1. धन्यवाद, पुरानी बस्ती में आते रहिएगा

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  5. बहुत सुंदर रचना है, झांकझोर दिया अंदर से

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    1. धन्यवाद कोशिश और भी अच्छा करने की होगी

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  6. thanks for the share as well as the audio help.
    it is a poem about the beauty of life that goes beyond skin deep superficialities/differences.

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  7. भावनाओ के ज्वार में शब्दों का बह जाना . ऐसी ही कविता निकलती है ह्रदय से... बहुत सुँदर .

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  8. एकदम उम्दा फनी देओल खुश हुआ

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