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#व्यंग्य - राष्ट्रध्वज आज बनता तो

हर १५ अगस्त को हम धूम धाम से आजादी त्यौहार का मनाते है। आजादी के त्यौहार के दिन अचानक से सभी तिरंगे के मान और सम्मान की बात करने लगते है। छोटा हो या बड़ा , जवान हो या बूढ़ा हर कोई एक दिन के लिए भगत सिंह और गांधी बन जाता है। आजादी के इस पावन पर्व के सबसे दुःख की बात ये है की हर नुक्कड़ पर आप को छोटे छोटे बच्चे तिरंगा बेचते मिल जाएंगे। कल मैंने जब एक ८-१० साल के लड़के को तिरंगा बेचते हुए देखा तो उसका सारा तिरंगा कुछ रुपये देकर खरीद लिए और उसे घर भेज दिया। तिरंगे के तीन रंगो और अशोक चक्र का चयन क्या दर्शता है वो आप विकिपीडिया पर पढ़ सकते है।

मैं तो सोच रहा हूँ की तिरंगा (भारत का राष्ट्रिय ध्वज) यदि आज बनता तो उसके मानक क्या होते?

जात - पात और भाषा की विधताओ से भरे इस देश में हर किसी की अपनी राय है। लोकतंत्र के माध्यम से यदि राष्ट्रध्वज बनाना होगा तो उसे कई साल लग जाएंगे। लोकसभा से विधनसभा और फिर राष्ट्रपति के चक्कर काटते - काटते राष्ट्रध्वज कितने रंगो का हो जाएगा इसका तो अनुमान ही लगाना मुश्किल है। हर किसी को खुश करने के चक्कर में तो राष्ट्रध्वज कभी बन ही नहीं पाएगा और यदि बना भी गया तो हर सत्ता में आई सरकार अपने वोट बैंक को खुश करने के चक्कर में उसमे कितना बदलाव करेगी ये तो विवादों में घिरे भारतरत्न से लगा सकते है।

कट्टर वादी हिन्दू कहेंगे की भगवा सबसे ऊपर की तरफ होना चाहिए क्योंकि वो हिन्दू धर्म का प्रतिक है। वही मुसलमान और सेक्युलर कहेंगे की माइनॉरिटी को ध्यान में रखते हुए हरे रंग को ऊपर रखना चाहिए। सफेद रंग के लोग अपनी तरफ से मारा मरी करेंगे और नीला रंग तो कहेगा की उन्हें राष्ट्र ध्वज में आरक्षण चाहिए। राजनीती दल भी एक कमिटी बनाकर उसे राष्ट्रध्वज के रंगो का निर्धारण करने में लगा देंगे। वही जो प्रेमी युगल दुनिया के सताए हुए है वो राष्ट्र ध्वज में गुलाबी रंग की मांग करेंगे। कही ऐसा न हो जाये की सभी को खुश करने के चक्कर में राष्ट्र ध्वज के १५ - २० तरह के संस्करण में बना दिया जाए।

अशोक चक्र को बदलने के खयाल से मेरा रोम रोम कांप उठता है। अशोक चक्र को हठाकर पंजा, कमल, हाथी, साईकिल, धनुष, बाण, हसिया, हल, सिटी और पता नहीं किस किस चिन्ह को लगाने की मांग हो जाए। जिस पार्टी के जितने संसद होंगे राष्ट्रध्वज में उसके रंग का अनुपात भी उसी तरह होगा। वही यदि किसी तरह जुगाड़ करके राष्ट्रध्वज बन भी गया तो पता चला अंत में कोई अनशन पर बैठ गया और राष्ट्रध्वज के निर्माण को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया। राष्ट्रध्वज की इस परिकल्पना से ये समझ आता है की जनतंत्र में निर्णय लेना कितना कठिन है और हम अक्सर मुद्दो को छोड़कर सभी बातो पर लड़ने के लिए तैयार है।


अगले सोमवार फिर मिलेंगे एक नए व्यंग के साथ।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. कोशिश तो हर बार बढ़िया व्यंग्य लिखने की होती है आप लोगो को कभी कभी पसंद आती है, पढ़ते रहिएगा

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  2. एक दम सही टिप्पणी ।पर हम ही तो जिताते हें नेताओ को

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    1. शायद से हमारे पास अधिक पर्याय भी नहीं है

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