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#कविता - सन्नाटा और अँधेरा

बहुत कम लोग अँधेरे से प्यार करते हैं , प्रायः लोग भूल जाते हैं कि  बिना अँधेरे की उजाले का कोई वजूद नहीं होता है I उसे कुछ पंक्तियों में व्यक्त कर रहा हूँ I

आसमां कितना साफ है।
दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ है ।
अँधेरा भी जैसे उजाला फैला रहा है।


क्या वक़्त यूही थम सकता है।
सूरज के बिना  क्या दीपक जल सकता है।
समझ न पाओगे मेरी बातों को तूम।
तुमने हमेशा उजाले से प्यार किया।
तुमने हमेशा अँधेरे का तिरस्कार किया।

आसमां कितना साफ है।
दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ है।
अँधेरा भी जैसे उजाला फैला रहा है।

टिप्पणियाँ

  1. भाई कितने कम शब्दों में आपने कितनी गहरी बात कह दी। सन्नाटे और अँधेरे के इर्द गिर्द शब्दों का जो जाल बुना है आपने वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है। आप शब्दों के स्पाइडर मैन हैं _/\_

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    1. धन्यवाद शुभांश, ४-५ पंक्तियाँ ही थी तो आपकी टिप्पणी का सम्मान करता हूँ

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