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#कविता - कल-कल करती नदी बह रही है

उछलती-कूदती नदी अपने जीवन से संघर्ष कर रही है।
हजारों बंधाए है मार्ग में, उनपर सरल चल रही है।
पहाड़ो से गुजरती, मैदानों में पसरती बढ़ रही है
कल-कल करती नदी मेरे सामने से बह रही है।।

बरखा की ऋतू में नदी मोरनी की तरह खूब इठलाती है।
अपने किनारे बसी कई जिंदगियो को बहा ले जाती है।
नदी की ममता ने लाखो लोगो को जीवन पहुचाया है।
कल-कल करती नदी मेरे सामने से बह रही है।।

मार्ग में आने वाली बँधाओ से डटकर लड़ती है।
कभी रुकती नहीं अड़चनों से सतत चलती है।
प्रवाह इसका खुद ब खुद राह बनाता चलता है।
कल-कल करती नदी मेरे सामने से बह रही है।।

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